Monday, July 2, 2007

मासूम मोहब्बत का बस इतना फसाना है


मासूम मोहब्बत का बस इतना फसाना है
कागज़ की हवेली है,बारिश का जमाना है
क्या शर्त्-ए-मोहब्बत है, क्या शर्ते-ए-ज़माना है
आवाज भी ज़ख्मी है, गीत भी गाना है
उस पार उतर्ने की उमीद्द बहुत कम है
कश्ती पुरानी है, तूफान को भी आना है
समझे या ना सम्झे वो अन्दाज़ मोहब्ब्त के
येक शख्स को आन्खो से एक शेयर सुनाना है
भोली सी अदा, कोई फिर इश्क़ की ज़ीद पर
इक आग का दरिया है , और डूब कर जाना है

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